अक्सर रहता है चिड़चिड़ापन या नींद की कमी… कहीं आपका बच्चा ‘डिजिटल एडिक्शन’ का शिकार तो नहीं?
स्मार्टफोन, इंटरनेट और आनलाइन गेमिंग का बढ़ता इस्तेमाल अब भारत में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती ‘डिजिटल एडिक्शन’ के रूप में सामने आ रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों और बड़ों दोनों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी, नींद की कमी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याओं को बढ़ा रहा है।
एम्स के बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक में आने वाले मरीजों के हालिया विश्लेषण में पाया गया है कि डिजिटल उपकरणों पर निर्भरता के मामले चिंताजनक स्थिति तक तेजी से बढ़ रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में सामने आया है कि देश में डिजिटल कनेक्शन पिछले एक दशक (2014 से 2024 ) में 25 करोड़ से बढ़कर करीब चार गुना (97 करोड़) हो गए हैं। देश के 85 प्रतिशत से अधिक घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद है। 15 से 24 वर्ष के किशोरों और युवाओं में इंटरनेट मीडिया व आनलाइन गेमिंग की लत सबसे अधिक देखी गई है।
क्या होता है डिजिटल एडिक्शन?
एम्स बिहेवियरल एडिक्शन क्लिनिक के प्रमुख मनोचिकित्सक डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा के अनुसार जब मोबाइल, इंटरनेट मीडिया या गेमिंग का उपयोग व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हो जाता है, पढ़ाई, काम, पारिवारिक जीवन तथा नींद प्रभावित होने लगती है, तो यह डिजिटल एडिक्शन का संकेत होता है। डॉ. बल्हारा के अनुसार हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें किशोर और युवा दिन-रात गेमिंग या सोशल मीडिया में लगे रहते हैं । इससे उनका ‘स्लीप साइकल’ बिगड़ जाता है, थकान बढ़ती है व गुस्सा – चिड़चिड़ापन आम है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो अवसाद, चिंता और अलगाव जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
दस वर्षों में तेजी से बढ़ा डिजिटल उपयोग
देश में डिजिटल उपयोग के तेजी से बढ़ने के कारण यह समस्या और गंभीर हो रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार भारत में इंटरनेट कनेक्शन 2014 के करीब 25 करोड़ से बढ़कर 2024 में लगभग 97 करोड़ हो गए हैं, वर्तमान में इनकी संख्या सौ करोड़ से अधिक आंकी जाती है । देश के 85 प्रतिशत से अधिक घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद है। सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक डिजिटल उपयोग से पढ़ाई और काम में ध्यान कम होना, नींद की कमी, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ने की आशंका रहती है।
मेलाटोनिन हार्मोन स्राव के प्रवाहित होने से नींद होती है खराब
एम्स विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रीन की नीली रोशनी शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को प्रभावित करती है, जिससे रात में नींद आने में देरी होती है और स्लीप क्वालिटी खराब हो जाती है। इसके अलावा आंखों में जलन, गर्दन-पीठ दर्द, मोटापा और हृदय संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं । डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा ने सलाह दी कि इससे बचने के लिए ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना प्रभावी उपाय हो सकते हैं। चेतावनी दी कि यदि समय रहते डिजिटल आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में यह बड़े मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संकट के रूप ले लेगी।
